राही

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घनघोर काली रात को चीरते हुए,
सुबह का पहला आभास,
और वो चल पड़ता |

सपनों के बीच मंडराते हुए,
उसका चेहरा चमकता हुआ,
आँखों में नींद छलकती सी,
दोगुना उत्साह लिए,
और वो चल पड़ता |

ज़िन्दगी को महसूस करता हुआ,
हर एक पल को जीता,
कभी दौड़ता, कभी रुकता,
ना सुनता, ना सुनाता,
बस कहता चलता |

काँटों को फूल बना,
ज़िन्दगी में मदहोश,
वो खुशियां बांटता चलता |

फिर श्याम ढलती,
और रात का बेसब्र इंतज़ार,
इकरार में बदलता |
कलम में सपने पिरोए,
वो फिर चल पड़ता |

 

Photo source : Google

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